ये कोमल हत्हलिया जब भी मेरा दामन छूती हैं
इक सकून रोम रोम मैं छाने लगता हैं
मेरी गोद मैं जब तू समां जाता हैं
मेरा ये मन गुन्गुनान्ने लगता हैं
तेरे आने से ही जिंदगी मैं बाहार आई हैं
वर्ना पतझड़ ने डेरा डाला था
तेरी किलकारियों ने अब सुर सजाया हैं
जिंदगी मैं अब इक नशा सा छाया हैं
तेरी बातों ने जाम मिलाया हैं